Tuesday, January 13, 2015

मुझे भुलाने का हुनर नहीं आता

एक रिश्ता रोज उगता है हथेली पर मेरे ,
रात टपकाती है जब यादों की ओस बूंद भर .
मुझे भुलाने का हुनर नहीं आता ,
न आता है कोई सकूनदार 
उठाने यादों की डस्टबिन मेरे घर , 
मेरे कमरे की दिवार में 
फ्यूचर की एक खिड़की हैं. 
इसी खिड़की पर मेरे यादों की डस्टबिन 
सजा रखा है मैंने गमले की तरह.
रात उगे इस रिश्ते को रोज सुबह बो देता हूँ
यादों की डस्टबिन में .
एक रिश्ता रोज उगता है हथेली पर मेरे ,
रात टपकाती है जब यादों की ओस बूंद भर .

    

Monday, December 8, 2014

हर दौर मुहब्बत थी जिद्दी

गुथ्थम  गुथ्थी ख़्वाबों से कर ,  हांफ  रहा  दिल  बंजारा 
दिल बच्चा है , दिल जीतेगा,  टूक  ताक  रहा  मैं आवारा
क्यूँ देखू कोई ख़्वाब नया,  ज़िद दिल की  मेरे  क्यूँ  तोडू
ग़र दिल बच्चा, मैं भी बच्चा .क्यूँ मानू मैं, क्यूँ मुँह मोडू
मर मजनूँ और रांझा जीते  ,  मर के जीता महिवाल मेरा    
हर दौर मुहब्बत थी जिद्दी , फिर क्यूँ मैं अपनी जिद छोड़ू  

Friday, October 31, 2014

मेरे खुद में , कम रह गया हूँ मैं खुद ही

मेरे खुद में , कम रह गया हूँ मैं खुद ही
साल दर साल तू बढ़ गया मुझमे ,
खामोश रहता हूँ , खूब हँसता हूँ
हँसते हँसते आँखे छलक पड़ती हैं कभी
पर गिरने नहीं देता उन्हें बाहर ,
एक दो बूँद ही सही
कही तू कम न हो जाये मुझमे
तेरी मासूमियत से भरी कोरी जिदें
और इलज़ाम भी ,
हमेशा रहे सर आँखों पर ,
अब तो यूँ भी कहूँ तो बज़ा न होगा
की उम्र भर हाँ जी उम्र भर  

तुम्हारा दर्द अब सो रहा है

बहुत दिन मैं तुम्हारे दर्द को सीने पे लेकर
जीभ कटवाता रहा हूँ ,
शहर दर शहर घूमता जा रहा हूँ
कई साल कटे हैं जाग कर ही
तुम्हारा दर्द दाखिल हो चूका नज़्म में
अब सो रहा है
पुराने सांप को आखिर अंधरे बिल में जा कर नींद आई है 

Sunday, August 24, 2014

क्यूँ घूरते हैं रात के पल

चुपचाप इस ख़ामोशी से
ये रात के पल क्यों देखते हैं मुझे ,
मैं अभी जग रहा हूँ
ये गुनाह है क्या ,
हैं तो बता दो सो जाऊंगा
पर घुरो मत मुझे ,
अकड़बाज़ रात के कारिंदे हो
तुम्हारी लाज रखने को डरना पड़ता है ,
फुसफुसा रहे हो , हवा को बुला रहे हो ? ,
अपने साथी से कहो
ये झींगुरों की आवाज न निकाले,
ये आवाज बचपन में करामाती थी
अब सिर्फ एक बासी धुन लगती हैं ,
कान के पास गुजरती हवा ने कहा
सो जा पगले फ़क़ीर ये तुझे क्या डराएंगे
तेरे सोते ही लिपट कर तुझसे ये भी सो जायेंगे,
ये मासूम तो इंतज़ार कर रहे हैं तेरे सोने का
तेरे लिए सुनहले ख्वाबो के हाट से
कुछ ख्वाब लाये हैं   .

Tuesday, February 26, 2013

ज़िन्दगी के आखिर का शुन्य



परत दर परत उतरती जा रही है ज़िन्दगी 
प्याज के छिलकों की तरह ,
आखिर के शुन्य से घबरायी 
मैं पूछती रहती हूँ 
आखिर कौन हूँ मैं , 
फलाने की बेटी  
चिलाने की बहन 
ढिमाके की पत्नी ,
कब तक मेरी संवेदनाओ को 
आलम्ब पकडाया जायेगा ,
कब तक मेरी पहचान की लता 
सूखे काठ पर चढाती रहूँ ,
दादी के लाख मनौतियों के बाद भी मैं जन्मी 
उदास कर गयी एक उत्सव की उमंग , 
टुकुर टुकुर ताकती उन आँखों पर 
बस माँ ने छुप छुप कर बलैयां ली थी , 
सेवा मेरा धर्म है
स्वीकर्यता मेरा शील , 
सहमति सभा में मेरी डोर 
पुरुषो के हाँथ में होती है , 
असहमति का स्वर 
मेरे बिगडैल होने का लक्छन बन 
दीवारों के पार फुसफुसाने लगता है , 
माडर्न भी होना है मुझे 
ताकि मेरे आस पास खड़े  
लोगो के चेहरे पर सभ्यता का मुखौटा चढ़ा रहे , 
परत दर परत छिलकों की तरह 
उतरती इस ज़िन्दगी के आखिर में 
मिलने वाले शुन्य से घबरायी 
मैं टटोलती रहती हूँ खुद को ,
पूछती रहतीं हूँ खुद से 
क्या मैं सिर्फ योनी हूँ ?
क्या मैं सिर्फ गर्भ हूँ ?
क्या मैं सिर्फ सेवक हूँ?
क्या मैं सिर्फ अनुकरण का व्याकरण हूँ ? 
मेरा स्वतंत्र अस्तित्व 
मेरी संवेदना की लता को
खुद पर ढो सकता है , 
प्याज के छिल्को सी उतरती 
ज़िन्दगी के आखिर का शुन्य 
मेरी पहचान नहीं हो सकता .