Friday, December 7, 2012

जय भारत भाग्य विधाता , जय हो वालमार्ट


 नीले नैना , बाल सुनहले फिगर है टिप टॉप ,
 परी नहीं ये सेल्सगर्ल है एफ डी आई छाप
 बिकेगा मल्टीब्रांड , सजेगा डेली प्राइस चार्ट ,
 जय हो भारत भाग्य विधाता , जय हो वालमार्ट


कंसल कोस्मेटिक,शर्मा किराना,गुप्ता जनरल स्टोर  ,
वही दुकाने  देख  देख कर हम भी हो गए है बोर
माल विदेशी ,मल्टी ब्रांड , उस पर कीमत सस्ती ,
जुगत न सूझे , देसी किराना कैसे बचाए हस्ती ,
स्मार्ट फोन का नया जमाना , अब मार्केट भी होगा स्मार्ट ,
जय हो भारत भाग्य विधाता , जय हो वालमार्ट


देशी किराना वाले बबुआ कर लो बंद दुकान
सीख लो झटपट,हैलो वेलकम थैंक्यू की जुबान
बढेगा अवसर रोजगार का, मिलेगा सेलरी में विदेशी नोट
सेल्समैन के इंटरव्यू खातिर,ले लो एक टाई एक कोट
शान से बोलो  “:मैं हूँ भारतीय इन माय हार्ट “
जय हो भारत भाग्य विधाता , जय हो वालमार्ट          

नीली स्लिव्लेश कुरते वाली


जब अचानक दिखी थी उसकी फोटो फेसबुक पर
बिछड़ने का जख्म कुछ पल को नरम पड़ गया था
नीली स्लीवलेश कुरते में मुस्कराती हुयी बड़े हो चुके बालों के बीच
उसकी हंसी अब भी उतनी ही बेगुनाह थी
अब भी उतनी ही मासूम थी उसकी हंसी
एक दुसरे की ख़ुशी के लिए
हम भीड़ बन गए एक दुसरे के लिए
पहली बार एक झूठ को
सच से भी ज्यादा अहमियत दिया था मैंने
पहले समझाया था खुद को
अब तो ये मानता भी हूँ की
मेरे बिना वो खुश होगी
और मैं खुश हूँ उसके बिना
पहली बार एक झूठ को
सच से भी ज्यादा अहमियत दिया है मैंने

Friday, October 8, 2010

काबिलेगौर ये है


मेरी मासूमियत को लकवा मार गया है
काबिलेगौर ये है
की मैं खुद से रूठ गया हूँ ,
गर्म कॉफी में तैरते बर्फ के टुकडे सा
जल रहा हूँ ग़ल रहा हूँ
घोलता हुआ फीकापन ,
पर अब तो संजीदा मसलो पर भी
बोल नहीं  फूटते ,
मेरी  ही मसलहत* की शिकार मेरी मासूमियत
टुकुर टुकुर ताकती है मुझे बेबस ,
मैं नज़रे फेर गुनगुनाने लगता हूँ
जैसे कुछ हुआ ही नहीं ,
पर काबिलेगौर ये है
की मैं खुद से रूठ गया हूँ
मेरी मासूमियत को लकवा मार गया है,

* मसलहत - Philosophy

Sunday, April 25, 2010

मैं ज़िन्दगी हूँ , मुस्कराना जानती हूँ

सतरंगी धूप की बेरंग तपिश सी
मैं फरेबी सब्जबाग नहीं जो मिराज़ बन जाऊं
मैं ज़िन्दगी हूँ खुद को आज़माना जानती हूँ
बेलौस बेधड़क छौंक सी हंसती हूँ
बासी खुशियों का मरहम
ताज़े ज़ख्मो पे रखती हूँ
 मैं ज़िन्दगी हूँ , मुस्कराना जानती हूँ
नाचती हूँ बंजारों सी बेफिक्र
मुझे घर नहीं आसमान चाहिए
मैं ज़िन्दगी हूँ ख्वाब सजाना जानती हूँ
इश्क फरेबी यार अजनबी
रिश्ते नाते हुए मतलबी
मैं चीखती नहीं
मैं ज़िन्दगी हूँ , दर्द गुनगुनाना जानती हूँ
मेरी आँखों के आलो में रोशन दीये
हर मात पे शय के सौ रास्ते
मैं डूबती नहीं
मैं ज़िन्दगी हूँ , पार जाना जानती हूँ

                                                

Saturday, March 13, 2010

कुछ पल को अभी चुप रहने दो

दर्द उकता गयें हैं
रिस रिस के,
कुछ दिन को अभी
तमाशा ये बंद है,
कुछ पल को अभी चुप रहने दो
मायूस ना हो
मैं  तड़पुंगा           
मजलिसे फिर सजेंगी
दर्द की मेरे
कुछ पल अभी चुप रहने दो 
तुम्हारी सोंधी हंसी के बिना
भला जी सकूँगा मैं ,
बड़े बेसब्रे हो
ख्वाबों में चले आते हो,
सोती आँखों से
भला रो सकूँगा मैं ,
कुरेदूंगा ज़ख्म अपना
तुम्हारे लिए
बिलबिला उठूँगा
नए अंदाज़ से
तब हंस लेना
कुछ पल को अभी चुप रहने दो!

Thursday, March 11, 2010

बस ख्वाब ही तो हैं

पतले गुलाबी नर्म से
तेरे ये होंठ,
इश्क़ की एक प्यारी सी
नज़्म ही तो हैं,
धर लूं अपने होंठो पे
चुपके से गुनगुना लूं,
खतावार ना कह
बस ये ख्यालात ही तो हैं ,
कभी तेरा जी नहीं करता
सर रख के मेरा गोद में
लोरी सुनाये मुझको
लम्हात ठहर जाएँ
सदियाँ गुज़र जाएँ
गुनहगार ना कह मुझको
ख्यालात हैं ये मेरे
मीठे से मेरे ख्वाब
बस ख्वाब ही तो हैं

Wednesday, March 10, 2010

बेवजह तुमने भी कुछ गुत्थियाँ बुन लीं

बेवजह तुमने भी कुछ गुत्थियाँ बुन लीं,
बियावन  है मेरी राह,
गुजरती जंगलों के
बीच,
पराये सच और अपने झूठ की
क्यों गाँठ बुन लीं,
बेवजह तुमने भी कुछ गुथियाँ बुन लीं!
थोथी बातें, नकली गीत
कैसे दिल बहलाओगे,
हम तो सच के सांप से
खेलें ,
तुम कैसे रह पाओगे,
आज तुमने फिर गलत एक राह चुन ली,
बेवजह तुमने भी कुछ गुत्थियाँ बुन लीं!
बे- शिकन चेहरे से मेरे
 मत भरम खाओ,
बड़े मासूम हो तुम
घर अपना कैसे जलाओगे,
हमने कहा था कुछ और
बात तुमने कुछ और सुन ली,
बेवजह  तुमने भी कुछ गुत्थियाँ बुन लीं!
चाहिए कुछ और ज़िन्दगी से
माँगते कुछ और हो,
सच की खूंटियों पे
टांगते कुछ और हो,
कैसे काटोगे सफ़र
ग़र ज़िन्दगी ने दुआ सुन ली
बेवजह तुमने भी कुछ गुत्थियाँ बुन लीं