Sunday, August 24, 2014

क्यूँ घूरते हैं रात के पल

चुपचाप इस ख़ामोशी से
ये रात के पल क्यों देखते हैं मुझे ,
मैं अभी जग रहा हूँ
ये गुनाह है क्या ,
हैं तो बता दो सो जाऊंगा
पर घुरो मत मुझे ,
अकड़बाज़ रात के कारिंदे हो
तुम्हारी लाज रखने को डरना पड़ता है ,
फुसफुसा रहे हो , हवा को बुला रहे हो ? ,
अपने साथी से कहो
ये झींगुरों की आवाज न निकाले,
ये आवाज बचपन में करामाती थी
अब सिर्फ एक बासी धुन लगती हैं ,
कान के पास गुजरती हवा ने कहा
सो जा पगले फ़क़ीर ये तुझे क्या डराएंगे
तेरे सोते ही लिपट कर तुझसे ये भी सो जायेंगे,
ये मासूम तो इंतज़ार कर रहे हैं तेरे सोने का
तेरे लिए सुनहले ख्वाबो के हाट से
कुछ ख्वाब लाये हैं   .

Tuesday, February 26, 2013

ज़िन्दगी के आखिर का शुन्य



परत दर परत उतरती जा रही है ज़िन्दगी 
प्याज के छिलकों की तरह ,
आखिर के शुन्य से घबरायी 
मैं पूछती रहती हूँ 
आखिर कौन हूँ मैं , 
फलाने की बेटी  
चिलाने की बहन 
ढिमाके की पत्नी ,
कब तक मेरी संवेदनाओ को 
आलम्ब पकडाया जायेगा ,
कब तक मेरी पहचान की लता 
सूखे काठ पर चढाती रहूँ ,
दादी के लाख मनौतियों के बाद भी मैं जन्मी 
उदास कर गयी एक उत्सव की उमंग , 
टुकुर टुकुर ताकती उन आँखों पर 
बस माँ ने छुप छुप कर बलैयां ली थी , 
सेवा मेरा धर्म है
स्वीकर्यता मेरा शील , 
सहमति सभा में मेरी डोर 
पुरुषो के हाँथ में होती है , 
असहमति का स्वर 
मेरे बिगडैल होने का लक्छन बन 
दीवारों के पार फुसफुसाने लगता है , 
माडर्न भी होना है मुझे 
ताकि मेरे आस पास खड़े  
लोगो के चेहरे पर सभ्यता का मुखौटा चढ़ा रहे , 
परत दर परत छिलकों की तरह 
उतरती इस ज़िन्दगी के आखिर में 
मिलने वाले शुन्य से घबरायी 
मैं टटोलती रहती हूँ खुद को ,
पूछती रहतीं हूँ खुद से 
क्या मैं सिर्फ योनी हूँ ?
क्या मैं सिर्फ गर्भ हूँ ?
क्या मैं सिर्फ सेवक हूँ?
क्या मैं सिर्फ अनुकरण का व्याकरण हूँ ? 
मेरा स्वतंत्र अस्तित्व 
मेरी संवेदना की लता को
खुद पर ढो सकता है , 
प्याज के छिल्को सी उतरती 
ज़िन्दगी के आखिर का शुन्य 
मेरी पहचान नहीं हो सकता .

Friday, December 7, 2012

नेशनल दामाद



एक है बंटी  एक है बबली दोनों बड़े है  खास
बंटी इज ए लकी मैन , पावरफुल है सास
पढ़ लिख के कुछ नहीं होना करो मेरा विस्वास
सक्सेस विल फॉलो यू , तुम ढुंढ़ों पावरफुल एक सास

पार्टी शार्टी , पोलो शोलो , बिना ब्याज का लोन
झट से लाख करोड़ बनेगा , कानून रहेगा मौन
मैंगो पीपुल करेगा शाऊटिंग, इन द रिपब्लिक ऑफ बनाना
फिकर नॉट, नेशनल दामाद का कुछ नहीं होना जाना

सासु माँ का नित नमन करो , लो उनका आशीर्वाद
पेड़ पे पैसे लग जायेंगे, बिन मिट्टी बिन खाद
सासु माँ की सेना,  बन कर कवच करेगी रक्षा
कैसा भी हो घोटाला , कर देगी साबित तुमको सच्चा

साले साहब को खुश रखना , देकर बोर्नविटा की बोतल
सासु माँ और बीबी पर रखना , फोकस अपना टोटल
कहें  " दामाद जी " आज से ही,  कर दो शुरू प्रयास
सक्सेस विल फॉलो यू , तुम ढुंढ़ों पावरफुल एक सास 

जय भारत भाग्य विधाता , जय हो वालमार्ट


 नीले नैना , बाल सुनहले फिगर है टिप टॉप ,
 परी नहीं ये सेल्सगर्ल है एफ डी आई छाप
 बिकेगा मल्टीब्रांड , सजेगा डेली प्राइस चार्ट ,
 जय हो भारत भाग्य विधाता , जय हो वालमार्ट


कंसल कोस्मेटिक,शर्मा किराना,गुप्ता जनरल स्टोर  ,
वही दुकाने  देख  देख कर हम भी हो गए है बोर
माल विदेशी ,मल्टी ब्रांड , उस पर कीमत सस्ती ,
जुगत न सूझे , देसी किराना कैसे बचाए हस्ती ,
स्मार्ट फोन का नया जमाना , अब मार्केट भी होगा स्मार्ट ,
जय हो भारत भाग्य विधाता , जय हो वालमार्ट


देशी किराना वाले बबुआ कर लो बंद दुकान
सीख लो झटपट,हैलो वेलकम थैंक्यू की जुबान
बढेगा अवसर रोजगार का, मिलेगा सेलरी में विदेशी नोट
सेल्समैन के इंटरव्यू खातिर,ले लो एक टाई एक कोट
शान से बोलो  “:मैं हूँ भारतीय इन माय हार्ट “
जय हो भारत भाग्य विधाता , जय हो वालमार्ट          

नीली स्लिव्लेश कुरते वाली


जब अचानक दिखी थी उसकी फोटो फेसबुक पर
बिछड़ने का जख्म कुछ पल को नरम पड़ गया था
नीली स्लीवलेश कुरते में मुस्कराती हुयी बड़े हो चुके बालों के बीच
उसकी हंसी अब भी उतनी ही बेगुनाह थी
अब भी उतनी ही मासूम थी उसकी हंसी
एक दुसरे की ख़ुशी के लिए
हम भीड़ बन गए एक दुसरे के लिए
पहली बार एक झूठ को
सच से भी ज्यादा अहमियत दिया था मैंने
पहले समझाया था खुद को
अब तो ये मानता भी हूँ की
मेरे बिना वो खुश होगी
और मैं खुश हूँ उसके बिना
पहली बार एक झूठ को
सच से भी ज्यादा अहमियत दिया है मैंने

Friday, October 8, 2010

काबिलेगौर ये है


मेरी मासूमियत को लकवा मार गया है
काबिलेगौर ये है
की मैं खुद से रूठ गया हूँ ,
गर्म कॉफी में तैरते बर्फ के टुकडे सा
जल रहा हूँ ग़ल रहा हूँ
घोलता हुआ फीकापन ,
पर अब तो संजीदा मसलो पर भी
बोल नहीं  फूटते ,
मेरी  ही मसलहत* की शिकार मेरी मासूमियत
टुकुर टुकुर ताकती है मुझे बेबस ,
मैं नज़रे फेर गुनगुनाने लगता हूँ
जैसे कुछ हुआ ही नहीं ,
पर काबिलेगौर ये है
की मैं खुद से रूठ गया हूँ
मेरी मासूमियत को लकवा मार गया है,

* मसलहत - Philosophy